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Hindi Poetry on Life: Beti Hai Jindgi

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बेटी

बचपन में जब पैदा हुई
कबूल हुई जिंदगी
   कहलाई वो बेटी
फ़र्ज  अदा किया उसने सुख में दुःख में
हाथ की रोटी उतारकर
पानी माँगा एक गिलास तो ले आई
वो प्यारे प्यारे खेत
वो प्यारे माँ बाप , वो पयारे भाई बहन
वो घर जहाँ  माँ बाप की ऊँगली पकड़कर खेली
वो घर जहाँ के पशु पक्षी की आवाजें थी उसकी धुन
वो घर जिसमे उसका रिश्ता था अटूट
किसी एक दिन कहते हैं 
विवाह की घड़ी है आई

बेटी थी वो अपना सब कुछ छोड़ आई
बचपन में पालकर
प्यार से संवार कर शिक्षा से जोड़कर
इंसानियत की तस्वीर बनाकर
कर दिया उसे विदा आँसूं  बहाकर
चली गयी वो सब कुछ छोड़कर  दुसरो के आँगन में
बिखेरी वहां पर भी खुशियाँ
माँ बाप को भुलाकर
समझ न पाई की यही है घर है उसका
या फिर जहा वो पली बढ़ी
उलझ गई संसार में
हर दुःख सहती गई
अपना सब कुछ त्याग आई
बेटी से जिंदगी  

बेटी है जिंदगी 














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